Bhakti Fest
Performance by Parvathy Baul

Ganga Resort

Parvathy Baul is a Practitioner of the Baul Path as well as a painter from West Bengal. She performs in the traditional style, using voice and movement, along with her Ektara (One stringed instrument), Duggi (drum) and Nupur (anklets) in meditative performance. She has practiced this path for over 20 years, having learned from the masters Sanatan Das Baul and Sashanka Goshai. She has also written a book - ‘Song of the Great Soul’ and released a few CDs with Baul Songs such as Sahajiya, Prem Geethi, Mystic etc.

She has been performing Baul since 1995, in India and the world. Besides her solo performances in Festival de l’imaginaire (Paris), Festival international du Conte et du Monodrame (Beirut, Libanon), and Ethnomad (Geneva, Switzerland), her guest appearances include prestigious venues like the Noh theatre at Kyoto (Japan) together with Kamigata-mai and Kyogen Performers, the World Music Center New York, Odin Teatret, Denmark, Chicago University, and Bread and Puppet Theatre, Vermont, USA.

About Ekathara Kalari

Ganga Resort

Ekathara Kalari is a space for sadhakas from the traditional knowledge streams of art, spirituality, theatre, puppetry, music and healing. Merging the concepts of the ‘Akhara’, a space for Baul practitioners from the Bengali tradition, and the ‘Kalari’, the traditional Kerala theatre practice space.

Ekathara Kalari was founded by Shri. Ravi Gopalan Nair and Smt. Parvathy Baul in 1997. The Kalari is open for a few selected students who would like to go through a period of intense training in the Baul Parampara. The Kalari has created many festivals, workshops, meetings and tours with contemporary masters and practitioners from all around the world.

Ekathara Kalari organizes the Tantidhatri Festival, an international women’s performing arts annual event. The Kalari also organizes regular Baul Gyan Darpan events (Baul Retreats). It also works with Baul Ashrams and established Baul Gurus and masters, documenting and researching various aspects of the tradition.

 

Pandev Nritya

 

महाभारत कालीन लोक नाट्य "चक्रव्यूह" का प्रचलन वैसे तो सम्पूर्ण भारत में अलग अलग तरह से विद्यमान है! भारत की प्रमुख लोक कलाओं में महाभारत कालीन इस घटना को अलग तरहों से परस्तुत किया जाता रहा है! पर बात जब उत्तराखण्ड के केदारनाथ घाटी की लोक कलाओं की हो तो वहाँ का प्रमुख लोक नाट्य चक्रव्यूह माना गया है ! एक- एक माह तक संचालित होने वाले पांडव नृत्यों में चक्रव्यूह के अतितिक्त- कमल-व्यूह, मकर्व्यूह, गरुढ़व्यूह बिंदु-व्यूह आदि लोक नाट्य अपना प्रमुख स्थान रखते हैं ! किन्तु इनमे प्रमुख रूप से चक्रव्यूह को सर्वाधिक रूप से मंचित किया जाता है जिसे उत्तराखण्ड का "मॉस थियेटर" भी कहा जाता है ! १० से ५० हज़ार तक के दर्शकों का जमवाड़ा इस लोक नाट्य को देखने के लिए एकत्र होता है ! महाभारत युद्ध के तेरहवें दिन की घटना चक्रव्यूह के नाम से ख्यात है! अर्जुन की अनुपस्थिति में गुरु द्रौंण द्वारा चक्रव्यूह की रचना होती है! पांडवों के पास अर्जुन के अलावा कोई ऐसा वीर नहीं जी चक्रव्यूह भेद सके! वीर अभिमन्यु, जिसने माता सुभद्रा के गर्भ में अर्जुन द्वारा बताई गई चक्रव्यूह भेदन की कला को सुना था, चक्रव्यूह भेदन के लिए उद्यत होता है! कहा जाता है कि अर्जुन जब सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदने की कला बता रहे थे तो सातवें द्वार के भेदन कि कला बताते वक्त सुभद्रा को नींद आ गई ! वीर अभिमन्यु सातवें द्वार की कला नहीं सुन सका ! फलतः सातवें द्वार पर अधर्म से कौरवों ने वीर अभिमानु को निहत्था कर, मौत के घात उतार दिया और वीर अभिमन्यु रण भूमि में शहीद हो गया !

प्रस्तुत लोक नाट्य को गढ़वाली संवादों, लोक गायिकी, आंचलिक वेशभूषा और परम्परिक शिल्प ले साथ प्रस्तुत किया गया है! जिसमे उत्तराखंड की उन समस्त प्रदर्शनकारी कलाओं का समावेश है जो यहाँ हमें विरासत में मिलीं है ! २ घंटे से अधिक की अवधि के इस नाट्य को ४० से ४५ सदस्यों द्वारा समग्र रूप से परस्तुत किया जाता है !

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